ग्रामसभा सम्मेलन में गरजे ग्लैडसन डुंगडुंग, पेसा नियमावली और पारंपरिक स्वशासन पर उठाए गंभीर सवा


विशेष रिपोर्ट
पेसा कानून का मूल उद्देश्य पारंपरिक ग्रामसभा को अधिकार देना था, लेकिन झारखंड की नियमावली में उसे कमजोर किया गया: ग्लैडसन डुंगडुंग
खूंटी/रांची:

क्षेत्रीय पारंपरिक ग्रामसभा सम्मेलन को संबोधित करते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने पेसा कानून, झारखंड पेसा नियमावली 2025 और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को लेकर विस्तृत और तीखा संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि जिस कानून का मूल उद्देश्य आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्रामसभाओं को संवैधानिक अधिकार और शासन की शक्ति देना था, उसी को लागू करने के नाम पर ऐसी नियमावली बनाई गई है, जो इन व्यवस्थाओं को कमजोर करती है।

अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने लोगों से एकजुट रहने और अपनी जगह, अपनी पहचान और अपनी ग्रामसभा को मजबूत करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि समाज अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं रहेगा, तो धीरे-धीरे उसकी जमीन, संसाधन और परंपराएं सब छिन जाएंगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे-जैसे लोग अपनी जगह छोड़ते हैं, वैसे-वैसे बाहरी लोग उस पर कब्जा करते जाते हैं।

डुंगडुंग ने पंचायत विभाग की पूर्व निदेशक निशा उरांव पर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि “रूढ़ि-प्रथा” के नाम पर समाज में नफरत फैलाने का काम किया गया और जो पेसा नियमावली तैयार की गई, उसी को सरकार ने थोड़े-बहुत बदलाव के साथ लागू कर दिया। उन्होंने कहा कि एक वर्ष तक चले आंदोलन के कारण कुछ संशोधन जरूर हुए, लेकिन मूल ढांचा आज भी वही है, जो पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के खिलाफ है।

डुंगडुंग ने पेसा कानून 1996 के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को सर्वोच्च मानते हुए उसे जल, जंगल, जमीन और खनिज संसाधनों पर अधिकार देने के लिए बनाया गया था। लेकिन वर्तमान नियमावली में ग्रामसभा को केवल कागजी अधिकार देकर वास्तविक शक्ति पंचायत और प्रशासन के हाथों में रखी गई है।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि ग्रामसभा की बैठक बुलाने का अधिकार पारंपरिक प्रमुख हातू मुंडा से छीनकर मुखिया को दे दिया गया है। उनके अनुसार, इससे ग्रामसभा की स्वायत्तता प्रभावित होती है और जमीन अधिग्रहण जैसे मामलों में पारदर्शिता कम हो जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था के जरिए फर्जी ग्रामसभाओं का रास्ता खुलता है, जहां लोगों को प्रभावित कर निर्णय लिए जा सकते हैं।

डुंगडुंग ने आगे कहा कि नियमावली में ग्रामसभा को योजना बनाने, अनुमोदन करने और खर्च की निगरानी का अधिकार तो दिया गया है, लेकिन योजनाओं को लागू करने का अधिकार पंचायत समिति को दिया गया है। उन्होंने इसे एक विरोधाभासी व्यवस्था बताते हुए कहा कि जब निर्णय ग्रामसभा ले रही है, तो क्रियान्वयन भी उसी के हाथ में होना चाहिए, तभी वास्तविक सशक्तिकरण संभव है।

उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे को भी विस्तार से उठाया। उन्होंने कहा कि योजनाओं के क्रियान्वयन में विभिन्न स्तरों पर कमीशन की व्यवस्था बनी हुई है, जिससे विकास कार्यों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और आम जनता को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि छोटी योजनाओं में ही बड़ी राशि विभिन्न स्तरों पर खर्च हो जाती है, जिससे जमीनी स्तर पर काम अधूरा या कमजोर रह जाता है।

अपने संबोधन में डुंगडुंग ने पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मुंडा, परगनाय और महाराजा जैसी व्यवस्थाएं सदियों से समाज को संचालित करती रही हैं और इन्हीं के आधार पर लोगों ने अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में इन पारंपरिक पदों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है, जो कि पेसा कानून की मूल भावना के खिलाफ है।

उन्होंने सामुदायिक संसाधनों के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि गांव की सीमा के भीतर आने वाले जंगल, पहाड़, नदी, बालू, पत्थर और अन्य संसाधनों पर ग्रामसभा का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेसा कानून की धारा 4(डी) और विभिन्न न्यायालयों के फैसले भी इसी बात की पुष्टि करते हैं, लेकिन नियमावली में इन अधिकारों को स्पष्ट रूप से लागू नहीं किया गया है।

डुंगडुंग ने नियमगिरी पहाड़ के उदाहरण का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह वहां ग्रामसभाओं ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बड़े कॉरपोरेट प्रोजेक्ट को रोका। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण दिखाता है कि यदि ग्रामसभा संगठित और जागरूक हो, तो वह अपने संसाधनों की रक्षा कर सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करना होगा। उन्होंने संगठनों के बीच एकता की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आपसी मतभेद और राजनीतिक विभाजन से समाज कमजोर होता है।

सम्मेलन में उन्होंने लोगों से अपील की कि वे पंचायत और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अंतर को समझें और अपनी पारंपरिक व्यवस्था को बचाने के लिए संगठित रहें। उन्होंने कहा कि यदि अभी भी समाज जागरूक नहीं हुआ, तो आने वाले समय में उसके पास कुछ भी नहीं बचेगा।

अंत में डुंगडुंग ने कहा कि पेसा कानून, सीएनटी एक्ट, वनाधिकार कानून और विभिन्न न्यायालयों के फैसले आदिवासी समाज के लिए महत्वपूर्ण उपकरण हैं, जिनका सही उपयोग कर अपने अधिकारों की रक्षा की जा सकती है। उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे अपनी ग्रामसभा को मजबूत करें, अपनी जमीन और संसाधनों की रक्षा करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत आधार तैयार करें।

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