झारखंड की आदिवासी संस्कृति में प्रकृति, परंपरा और पूर्वजों की विरासत का विशेष महत्व है। इसी परंपरा को जीवित रखने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री के बड़े मामाजी गुरूचरण किस्कू पारंपरिक सेंदरा (शिकार) कार्यक्रम में शामिल होने के लिए चांडिल स्थित अपने आवास से समाज के लोगों के साथ रवाना हुए।
यह आयोजन केवल शिकार यात्रा नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, एकता और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। सेंदरा के माध्यम से समाज अपने पारंपरिक मूल्यों और सामूहिकता को सशक्त करता है।
इससे पहले 21 मार्च 2026 को चांडिल के गोलचक्कर स्थित दिशोम जाहेर थान में “प्रकृति बाहा” बोंगा का आयोजन शांतिपूर्ण और पारंपरिक तरीके से किया गया। इस दौरान साल वृक्ष, धरती माता और प्रकृति के प्रति आस्था व्यक्त की गई तथा पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
सरहुल-बाहा पर्व के दूसरे दिन मनाया जाने वाला “बाहा सेंदरा” आदिवासी समाज की प्राचीन परंपरा है। हालांकि, जंगलों में कमी के कारण अब यह परंपरा कई स्थानों पर रैली या सांकेतिक रूप में आयोजित की जा रही है।
आज भी सेंदरा कार्यक्रम रैली के रूप में आयोजित किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में समाज के लोग भाग लेंगे। यह आयोजन समाज को प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने, एकजुट रहने और अपनी सांस्कृतिक पहचान को सहेजने का संदेश देता है।