निशा उरांव पर “रूढ़ि-प्रथा के नाम पर नफरत फैलाने” का आरोप, पेसा नियमावली में हातु मुंडा की जगह मुखिया को दिया अधिकार:ग्लैडसन


निशा उरांव पर “रूढ़ि-प्रथा के नाम पर नफरत फैलाने” का आरोप, पेसा नियमावली में हातु मुंडा की जगह मुखिया को दिया अधिकार: ग्लैडसन
खूंटी/झारखंड:

मानवाधिकार कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने ग्रामसभा को संबोधित करते हुए पंचायत विभाग की पूर्व निदेशक निशा उरांव पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राज्य में लागू की गई पेसा नियमावली पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को कमजोर करने वाली है और इसे थोड़े-बहुत बदलाव के साथ सरकार ने स्वीकार कर लिया है।

डुंगडुंग ने कहा कि एक वर्ष तक चले आंदोलन के कारण कुछ संशोधन जरूर हुए, लेकिन मूल ढांचा अब भी वही है, जो पारंपरिक व्यवस्था के खिलाफ है। इस दौरान उन्होंने निशा उरांव पर यह भी आरोप लगाया कि वे “रूढ़ि-प्रथा” के नाम पर आदिवासी समाज के खिलाफ नफरत फैलाती हैं।

उन्होंने पेसा नियमावली के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए कहा कि विशेष ग्रामसभा बुलाने का अधिकार पारंपरिक प्रमुख (हातू मुंडा) से छीनकर मुखिया को दे दिया गया है। उनके अनुसार, इससे जमीन अधिग्रहण जैसे मामलों में गड़बड़ी की आशंका बढ़ जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुखिया के माध्यम से फर्जी ग्रामसभाएं आयोजित कर भूमि हस्तांतरण को आसान बनाया जा सकता है।

डुंगडुंग ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था में ग्रामसभा की भूमिका सीमित कर दी गई है। ग्रामसभा योजना बनाती है, अनुमोदन करती है और खर्च का आकलन भी करती है, लेकिन योजनाओं को लागू करने का अधिकार पंचायत समिति को दिया गया है। उन्होंने इसे “व्यवस्था में विरोधाभास” बताते हुए कहा कि इससे स्थानीय समुदाय सशक्त नहीं हो सकता।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि इस व्यवस्था के कारण योजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की संभावना बनी रहती है। उनके अनुसार, विभिन्न स्तरों पर कमीशन की वजह से योजनाओं का वास्तविक लाभ गांव तक नहीं पहुंच पाता और कार्यों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।

डुंगडुंग ने कहा कि पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता देने के बजाय उसमें सरकारी पदाधिकारियों को शामिल कर दिया गया है, जो इसकी मूल भावना के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि ग्रामसभा को पूरी तरह सशक्त किया जाए और योजनाओं का पैसा सीधे ग्रामसभा के खाते में दिया जाए।

अपने संबोधन में उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इस तरह की “थोपी गई व्यवस्था” को स्वीकार न करें और अपनी पारंपरिक शासन प्रणाली की रक्षा के लिए एकजुट रहें।

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