ओल चिकी लिपि शताब्दी वर्ष में मिला सम्मान, संथाल समाज के लिए गर्व का क्षण

घाटशिला: संथाल समाज की भाषा, संस्कृति और पहचान का प्रतीक ओल चिकी लिपि अपने 100 वर्ष पूरे कर चुकी है। यह शताब्दी वर्ष संथाल समाज के लिए केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को याद करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण अवसर भी है। यह उपलब्धि संथाल समाज की सांस्कृतिक चेतना और भाषा के प्रति समर्पण को भी दर्शाती है।

नई दिल्ली में भव्य शताब्दी समारोह का आयोजन
15–16 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में स्थित Dr. Ambedkar International Centre में ओल चिकी लिपि के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में भव्य शताब्दी समारोह आयोजित किया गया। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए विद्वानों, शिक्षाविदों और संथाल समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और ओल चिकी लिपि के महत्व पर विचार साझा किए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया ऐतिहासिक समारोह का उद्घाटन
16 फरवरी को इस समारोह का उद्घाटन भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने ओल चिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि भाषा और लिपि किसी भी समाज की सांस्कृतिक आत्मा होती है। उन्होंने संथाल समाज के उस प्रयास की सराहना की, जिसके माध्यम से अपनी भाषा और संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने का कार्य निरंतर जारी है।

घाटशिला में शिक्षाविदों को किया गया सम्मानित
शताब्दी वर्ष के इसी क्रम में 15 मार्च 2026 (रविवार) को घाटशिला स्थित धाड़ दिशोम माझी पारगना महल में एक कार्यक्रम आयोजित की गई थी। इस अवसर पर कई संताली शिक्षाविदों और भाषा प्रचारकों को ओल चिकी लिपि के प्रचार-प्रसार में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

फागुन पत्रिका की ओर से दिया गया विशेष सम्मान
कार्यक्रम में “फागुन पत्रिका” की ओर से शिक्षाविदों को डाक टिकट, प्रमाण-पत्र, Ministry of Culture का मोमेंटो तथा पारंपरिक अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। इस सम्मान समारोह ने संथाली भाषा और संस्कृति के प्रति समर्पित लोगों के कार्यों को नई पहचान और प्रेरणा दी।

पूरे संथाल समाज के लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण
यह सम्मान केवल कुछ संताली शिक्षकों या विद्वानों का व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि यह पूरे संथाल समाज की भाषा, संस्कृति और पहचान के प्रति किए जा रहे सामूहिक प्रयासों का सम्मान है। ओल चिकी लिपि की यह शताब्दी आने वाली पीढ़ियों को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए निरंतर प्रेरित करती रहेगी। 

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