अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि समय के साथ सनातन समाज में वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथों के कारण पूजा पद्धतियों में बदलाव आए, जबकि आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक पूजा पद्धति को लंबे समय से सुरक्षित रखा है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पूजा पद्धतियां होने के बावजूद सभी का उद्देश्य ईश्वर और प्रकृति के प्रति श्रद्धा प्रकट करना है। उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत के जनजातीय संवाद कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग पूजा पद्धतियां अलग रास्तों की तरह हैं, लेकिन उनका लक्ष्य एक ही है।
गौरतलब है कि निशा उरांव भारतीय राजस्व सेवा की अधिकारी रही हैं और झारखंड सरकार में पंचायती राज विभाग की निदेशक के पद पर भी कार्य कर चुकी हैं। बाद में वे अपर आयकर आयुक्त के पद पर भी नियुक्त रहीं।
वहीं दूसरी ओर, आदिवासी स्वशासन व्यवस्था से जुड़े कई संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा और धार्मिक आस्था अलग है। उनका कहना है कि आदिवासी समाज लंबे समय से खुद को हिंदू, ईसाई या मुस्लिम धर्म से अलग मानता आया है। कई आदिवासी संगठनों का कहना है कि जब दुनिया में कोई धर्म स्थापित नहीं हुआ था, तब से आदिवासी समाज अपनी पारंपरिक आस्था और जीवन पद्धति के साथ अस्तित्व में है। इसी कारण वे खुद को किसी अन्य धर्म के साथ जोड़े जाने का विरोध भी करते रहे हैं।
इस मुद्दे को लेकर कई बार विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा सड़कों पर प्रदर्शन भी किए गए हैं। उनका कहना है कि आदिवासी समाज अपने पूर्वजों की रूढ़ि-प्रथा, परंपरा और प्रकृति आधारित आस्था को मानता है, इसलिए जनगणना में अलग सरना धर्म कोड की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है, ताकि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को स्वतंत्र रूप से मान्यता मिल सके।
Tags
Jharkhand
