रांची : झारखंड की राजधानी रांची के नगड़ी में आदिवासी किसानों का ‘हल जोतो, रोपा रोपो’ आंदोलन ने आज जोर पकड़ा, नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले सैकड़ों आदिवासी और मूलवासी किसानों ने प्रस्तावित रिम्स-2 (राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) परियोजना के लिए उनकी उपजाऊ खेतों के अधिग्रहण के खिलाफ एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया।
इस आंदोलन में पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपाई सोरेन भी शामिल होने वाले थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें सुबह से हाउस अरेस्ट कर दिया।
नगड़ी मौजा में सुबह 11 बजे शुरू हुए इस आंदोलन में किसानों ने अपने खेतों में हल चलाकर और धान की रोपाई कर विरोध दर्ज किया। महिलाएं और पुरुष, दोनों ही पारंपरिक औजारों के साथ खेतों में उतरे, यह संदेश देते हुए कि उनकी जमीन उनकी आजीविका और अस्मिता का आधार है, प्रशासन ने जगह-जगह बैरिकेडिंग और भारी पुलिस बल तैनात कर आंदोलन को दबाने की कोशिश की कई किसानों, को हिरासत में लिया गया, और अनुच्छेद 244 (1) वाले क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दी गई।
चंपाई सोरेन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका विरोध रिम्स-2 के निर्माण से नहीं, बल्कि बिना सहमति के आदिवासियों की खेती योग्य जमीन छीनने से है, उन्होंने सवाल उठाया, “जब सरकार के पास लैंड बैंक और स्मार्ट सिटी जैसी परियोजनाओं के लिए सैकड़ों एकड़ बंजर जमीन उपलब्ध है, तो उपजाऊ खेतों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है?” एक स्थानीय किसान, रामू उरांव ने भावुक होकर कहा, “यह हमारी माई-माटी है, हम इसे लुटने नहीं देंगे।” आंदोलन में शामिल महिलाओं ने इसे जीवन-मरण का सवाल बताया।
ऐसे ही पिछले बीजेपी सरकार में भी गोड्डा में अडानी पावर प्लांट लगाने के लिए आदिवासियों के धान लगे खेत में बुलडोजर चलाया था।
यह पहली बार नहीं है जब झारखंड में आदिवासियों की जमीन विकास के नाम पर अधिग्रहित की गई है, रघुवर दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार (2014-2019) के दौरान गोड्डा जिले में अडानी पावर लिमिटेड के लिए 517 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जिसमें उपजाऊ खेत शामिल थे। इस परियोजना के तहत 1600 मेगावाट का कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट बनाया गया, जिसका उद्देश्य बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति करना था। गोड्डा के मोतिया, गंगटा गोविंदपुर, पटवा, माली, सोनडीहा और गायघाट गांवों के रैयतों ने आरोप लगाया कि उनकी जमीन बिना उचित सहमति और मुआवजे के जबरन ली गई। लुखुमोयी मुर्मू जैसी स्थानीय महिलाओं ने मीडिया को बताया था, “हमने अपनी जमीन नहीं दी, फिर भी अधिग्रहण हो गया।” सूत्रों के अनुसार, गोड्डा को इस प्रोजेक्ट के लिए चुना गया क्योंकि पश्चिम बंगाल में बात नहीं बनी, और झारखंड में भाजपा सरकार होने से प्रक्रिया आसान हुई, गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे ने भी इस परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।रघुवर दास ने दावा किया था कि यह पावर प्लांट रोजगार के अवसर पैदा करेगा, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि रोजगार के वादे खोखले साबित हुए, और उनकी आजीविका छिन गई, अडानी समूह के रांची स्थित हेड (कॉर्पोरेट अफेयर्स) अमृतांशु प्रसाद ने विरोध को “विकास विरोधी” करार दिया, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी जमीन और अस्मिता पर हमला मानते हैं।
आदिवासी जमीन पर विकास के नाम पर विस्थापन का सिलसिला
चाहे भाजपा, कांग्रेस या झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार हो, विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण का सिलसिला थम नहीं रहा नगड़ी और गोड्डा के मामले इसकी बानगी हैं, पत्थलगड़ी आंदोलन (2016-2017) में भी आदिवासियों ने छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में संशोधनों के खिलाफ आवाज उठाई थी, जो उनकी जमीन को कॉरपोरेट्स के लिए खोलने की कोशिश थी। तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने जन दबाव के चलते इन बिलों को मंजूरी नहीं दी थी।
आदिवासी समाज के लोगों का कहना है कि शहरों में घरों को तोड़कर परियोजनाएं नहीं बनाई जातीं, लेकिन आदिवासी गांवों की उपजाऊ जमीन बार-बार निशाना बनती है। नगड़ी के आंदोलन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि विकास की कीमत हमेशा आदिवासी समुदायों को ही क्यों चुकानी पड़ती है।
नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति ने ऐलान किया है कि यह लड़ाई अब सड़क से अदालत तक जाएगी। चंपाई सोरेन ने इसे आदिवासी झारखंडी हक-अधिकार की लड़ाई करार दिया है यह आंदोलन न केवल जमीन की रक्षा, बल्कि झारखंड की आदिवासी अस्मिता और संस्कृति को बचाने का प्रतीक बन गया है। जैसे-जैसे यह मामला तूल पकड़ रहा है, यह झारखंड की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है।






