झारखंड विधानसभा में कुर्मी/कुड़मी महतो समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने का मुद्दा एक बार फिर जोर-शोर से उठा। विधायक जयराम महतो ने सदन में इस विषय पर विस्तृत वक्तव्य देते हुए राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार को नई अनुशंसा भेजे और इस दिशा में ठोस पहल करे।
जयराम महतो ने अपने संबोधन में कहा कि इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) से एथनोग्राफिक अध्ययन कराकर प्रमाणिक रिपोर्ट तैयार कराई जानी चाहिए। उनके अनुसार, ऐतिहासिक और सामाजिक तथ्यों के आधार पर यह समुदाय ST सूची में शामिल होने का हकदार है।
उन्होंने झारखंड आंदोलन का हवाला देते हुए कहा कि कुर्मी/कुड़मी महतो समाज ने राज्य निर्माण की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जयराम महतो के मुताबिक, निर्मल महतो सहित कई लोगों ने इस आंदोलन में अपनी जान दी और यह योगदान राज्य के इतिहास का अहम हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड आंदोलन को गति विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन के नेतृत्व वाले समूहों के एकीकरण से मिली।
सदन में बोलते हुए जयराम महतो ने यह दावा भी किया कि 1872 से 1931 तक की जनगणनाओं में इस समुदाय को आदिम जनजाति के रूप में दर्ज किया गया था, लेकिन 1950 में बिना स्पष्ट अधिसूचना के उन्हें ST सूची से बाहर कर दिया गया। उनके अनुसार, इसके पीछे एक कारण यह भी रहा कि जिन क्षेत्रों में यह समुदाय रहता था, वहां खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में थी, जिससे जमीन अधिग्रहण आसान बनाया जा सके।
उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड के कई बड़े औद्योगिक और खनन प्रोजेक्ट—जैसे कोयला कंपनियां और टाटा के विभिन्न प्रोजेक्ट—कुर्मी/कुड़मी महतो समुदाय की जमीनों पर स्थापित हैं। जयराम महतो के मुताबिक, कई डैम, पावर प्लांट और औद्योगिक इकाइयां भी इसी जमीन पर विकसित की गई हैं।
अपने भाषण में जयराम महतो ने यह आरोप भी लगाया कि इस समुदाय को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिशें की गईं। उन्होंने कुछ प्रमुख नेताओं की मौत का जिक्र करते हुए कहा कि ये घटनाएं कई सवाल खड़े करती हैं और इन्हें महज संयोग नहीं माना जा सकता। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
उन्होंने सांसद सुनील महतो की हत्या का भी उल्लेख किया और कहा कि उस समय उनके केंद्रीय मंत्री बनने की चर्चा थी। इस संदर्भ को भी उन्होंने अपने तर्क के रूप में रखा।
जयराम महतो ने यह भी कहा कि कुर्मी/कुड़मी महतो समुदाय की अपनी अलग भाषा, संस्कृति, पर्व-त्योहार और धार्मिक परंपराएं हैं, जो उन्हें एक विशिष्ट पहचान देती हैं। उन्होंने 1990 की “रिपोर्ट ऑफ कमिटी ऑन झारखंड मैटर्स” का हवाला देते हुए कहा कि इसमें भी इस क्षेत्र के विभिन्न समुदायों की भूमिका को मान्यता दी गई थी।
अपने संबोधन के अंत में जयराम महतो ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह सभी तथ्यों की समीक्षा कर कुर्मी/कुड़मी महतो समुदाय को ST में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजे।
विधानसभा में उठाया गया यह मुद्दा नया नहीं है, लेकिन जयराम महतो द्वारा इसे विस्तार से उठाने के बाद यह फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। एक ओर यह सामाजिक पहचान और अधिकार से जुड़ा विषय है, वहीं दूसरी ओर इसमें ऐतिहासिक दावों और वर्तमान कानूनी प्रक्रिया की जटिलता भी शामिल है। ऐसे में आगे का रास्ता राज्य सरकार की पहल और केंद्र के निर्णय पर निर्भर करेगा।
