गम्हारिया :- प्रकृति और मानव के अटूट रिश्ते का प्रतीक ‘बाहा बोंगा’ सोमवार को टायो (कलिकापुर) स्थित दिशोम जाहेरगाड़ में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सिंग दिशोम के खेरवाड़ सांवता जाहेरगाड़ समिति,कलिकापूर द्वारा आयोजित इस ‘दिशोम बाहा बोंगा’ उत्सव में हजारों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग जुटे। पूरा इलाका पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और लोकगीतों से गूंजता रहा।
प्रकृति के पुनर्जन्म का संदेश !
संथाल समाज में ‘बाहा’ अर्थात सखुआ फूलों का पर्व नए वर्ष और प्रकृति के नए जीवन का प्रतीक है। कार्यक्रम की शुरुआत जाहेरथान में नाईके बाबा ने अपने विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना कर की। उन्होंने प्रकृति शक्तियों की आराधना करते हुए समाज की सुख-शांति और समृद्धि की कामना की।
सखुआ फूलों का आशीर्वाद और पारंपरिक साज-धाज !
नाईके बाबा ने श्रद्धालुओं को सखुआ का फूल आशीर्वाद स्वरूप प्रदान किए। महिलाओं ने फूलों को अपने बालों में सजाया, जबकि पुरुषों ने कानों में धारण किया। कार्यक्रम में पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित दिखे। तुमदाग, टामाक और बड़े धमसा की थाप पर सामूहिक नृत्य किए। लोकगीतों और नृत्य के माध्यम से प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
जल, जंगल और जमीन का संदेश !
इस अवसर पर विभिन्न गांवों के माझी, पारगना और समाज के बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। लुगु बुरु गोडेत सुरेन्द्र टुडू ने कहा कि बाहा बोंगा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन की पहचान है। उन्होंने बताया कि इस बदलते समय के बावजूद शहरों में भी संथाल युवा-युवतियां पारंपरिक परिधान में शामिल होकर अपनी संस्कृति से जुड़ाव दिखा रहे हैं।
युवा पीढ़ी के लिए संदेश !
लुगु बुरु गोडेत ने समाज से अपने पारंपरिक पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों को प्राथमिकता देने की अपील की। उन्होंने युवाओं को अन्य धर्मों के अनुष्ठानों से दूरी बनाकर अपनी संस्कृति को सहेजने का संदेश दिया। साथ ही कहा कि आने वाले होली के दौरान वह रंग ना खेलें क्योंकि यह संथाल समाज के रीति रिवाज की विरुद्ध है संथाल समाज की रिवाज के अनुसार विशेषकर अविवाहित महिलाओं पर रंग लगाना अशुभ माना जाता है।
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