प्रकृति के रंगों में सराबोर हुआ शहरबेड़ा दिसोम जाहेरथान में श्रद्धा और उल्लास के साथ मना 'दिसोम बाहा बोंगा'


चांडिल (सरायकेला-खरसावां): प्रकृति और मनुष्य के अटूट प्रेम का प्रतीक 'बाहा पर्व' शनिवार को शहरबेड़ा स्थित दिसोम जाहेरथान में धूमधाम से मनाया गया। बारहा दिसोम माझी पारगाना महल के तत्वावधान में आयोजित इस 'दिसोम बाहा बोंगा' उत्सव में हजारों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए। पूरा क्षेत्र पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और लोकगीतों से गुंजायमान रहा।

साल के फूलों के साथ हुआ नए साल का स्वागत

संथाल समाज में 'बाहा' यानी फूलों का त्योहार नए साल और प्रकृति के पुनर्जन्म का संदेश लेकर आता है। उत्सव की शुरुआत जाहेरथान में विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना से हुई। नाइके बाबा ने प्रकृति की शक्तियों की आराधना की और समाज की सुख-समृद्धि व खुशहाली की कामना की। 

विशेषता: मान्यता है कि जब तक साल (सखुआ) के पेड़ों पर नए फूल नहीं खिलते, आदिवासी समाज प्रकृति की नई फसलों या फूलों का उपयोग नहीं करता। नाइके बाबा ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद स्वरूप साल के फूल भेंट किए, जिसे महिलाओं ने अपने जूड़े में और पुरुषों ने कान पर धारण किया।

पारंपरिक वेशभूषा और नृत्य का संगम

उत्सव में समाज के पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपने आकर्षक पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे नजर आए। तुमदाग्, टामाक और धमसा की थाप पर थिरकते कदमों ने माहौल को उत्सवपूर्ण बना दिया। सामूहिक नृत्य और लोकगीतों के जरिए प्रकृति के प्रति आभार प्रकट किया गया। 

जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का आह्वान 

इस भव्य आयोजन में कई गांवों के माझी परगना और प्रबुद्धजन शामिल हुए। मौके पर वक्ताओं ने कहा कि: बाहा बोंगा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का जरिया है, यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है।

युवा पीढ़ी को अपनी विलक्षण संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं को सहेजने की आवश्यकता है। यह उत्सव शांति और सद्भाव के संदेश के साथ संपन्न हुआ, जो समाज को अपनी पहचान और पर्यावरण के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा दे गया।



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