निशा ने कुर्मी समुदाय की मांग को राजनीतिक स्टंट करार देते हुए कहा कि उनकी मांग संवैधानिक रूप से गलत है। उन्होंने 1931 की जनगणना का हवाला देते हुए कुर्मी नेताओं से सवाल किया कि अगर उनके पूर्वज आदिवासी थे, तो तब विरोध क्यों नहीं हुआ? उन्होंने आदिवासियों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान पर जोर देते हुए कहा कि भगवान बिरसा मुंडा जैसे नेताओं ने आदिवासियों के अस्तित्व को स्थापित किया। निशा ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी निशाना साधा, आरोप लगाया कि वह सत्ता की लालच में आदिवासी हितों की अनदेखी कर रहे हैं।
उन्होंने कुर्मी नेताओं को संविधान के तहत अपनी मांग साबित करने की चुनौती दी और कहा कि आदिवासियों की जल, जंगल, जमीन और संस्कृति खतरे में है। निशा ने स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता आदिवासी समुदाय और उनकी परंपराएं हैं, और वह किसी भी कीमत पर इसे कमजोर नहीं होने देंगी।

