भाईयों और बहनों।
भड़ान (Bhadan) या मृत्य भोज
"एक सामाजिक परंपरा या जश्न"
एक परिवार का सदस्य मर जाता है, कोई स्त्री विधवा हो जाती है, कोई बच्चा अनाथ हो जाता है।परिवार बेसहारा हो जाता है, कोई मां बाप अपने जिगर के टुकड़ों को खो देते है। परिवार गम में डूबा रहता है, कैसे संभले - जीवन को आगे कैसे जीए,फिर एक दिन वही परिवार मरे हुए व्यक्ति के नाम पर भांडन या मृत्य भोज का आयोजन करते है सामाजिक परम्पराओं को निभाते है।
मृतक परिवार के लोग मरे व्यक्ति के भंडान या मृत्य भोज के लिए दूसरों से कर्जा लेते है कई चीजें बेचते है। हर काम को करते समय उसके आंखों से आंसू टपक रहे होते है।मृतक के परिवार मेहमानों के लिए मुर्गा बकरा हंडिया दारू की बेवस्ता (Arrangement) करते है भले ही उस परिवार की सभी जमा पूंजी खत्म हो जाए ऐसा लगता है मानो शादी का माहौल हो और गांव वालों और मेहमानों को नमी आंखों और गम हृदय से खिलाता पिलाता है।
जिस घर में दुखों का पहाड़ टूटा है खुद गम के कारण खाना नहीं खा पा रहा हो, आगे को जिंदगी कैसे जिएंगे उसकी समझ में न आ रहा हो मुझे नहीं मालूम उस घर में मुर्गा दारू हंडिया खाना - पीना करना, कितना उचित होगा ऐसा लगता है मानो रिस्तेदारो और गांव वालो मिल कर उस परिवार को सामूहिक रूप से दण्डित कर रहे है।कोई कैसे अपने परिवार के सदस्य के मर जाने से खुशी हो सकते है खाने वालो को भी सोचना चाहिए।
हमारे लिए शायद प्रासंगिक नहीं हो, महाभारत में कहते है, भगवान कृष्ण ने दूर्यधन को मनाने के लिए उसका घर गया था की युद्ध मत करे, इसे किसी का भला नही है सभी का नुकसान ही होगा, पर दुर्योधन नही माने तभी भगवान कृष्ण वापस जा रहे थे तब दूर्यधन ने कृष्ण से कहा कि भोजन करके जाए तभी कृष्ण ने कहा की आदमी अगर दुखी हो और खिलाने वाले का मन भी दुखी हो, तो वहां भोजन नहीं करना चाहिए।
आदमी जब जीवित/बीमार था तो ५०० रूपया देने के लिए हम कई बार सोचते है पर मरने के बाद ५००० रुपया का बकरा लेकर पहुंच जाते है जीते जी अगर हम सभी रिश्तेदार कुछ आर्थिक मदत्त करते तो आदमी कुछ दिन और जी सकता है।
एक बच्चा अपने पिता के अस्थि (दुरीब) को लेकर खड़े है और कुछ लोग दारू हंडिया पी रहे होते है।पीड़ित परिवार के दिल में क्या बीतती होगी।क्या हम इतनी संवेदनहीन हो गए है।ये कैसा परम्परा, अगर मृतक के परिवार पैसा ही खर्च करना चाहते है तो पैसा को सामाजिक उपकार, या पुण्य काम में लगा सकते है मृतक के नाम से गरीब बच्चा बच्ची को पढ़ाने में मदत करे घर के बच्ची या अनाथ बच्ची के नाम से बैंको में फिक्स डिपोजिट कर सकते है और भी बहुत कुछ मृतक के नाम से सामाजिक कल्याण का काम कर सकते है जिससे मृतक को हमेशा याद रखा जा सकता है। फिजूल खर्चा से बचे. धन्यवाद।
आइए जागे, चिंतन करे!
कन्हाई हंसदा!
आदिवासी चेतना मंच!

