जमशेदपुर: माझी पारगना माहाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, धाड़ कुचूं बारहा पातकोम सिञ दिशोम एवं कोल्हान प्रमंडल के संयुक्त तत्वावधान में आगामी 6 सितंबर 2026 को दिसोम जाहेरथान, कोरोनडीह में ‘धोरोम सेनेलेद् 2026’ का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर गुरुवार को सर्किट हाउस परिसर, बिष्टुपुर, जमशेदपुर में संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता तोरोप पारगना बाबा दसमत हांसदा ने की।
संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए परगना बाबाओं ने कहा कि आदिवासी इस देश के मूल निवासी और दुनिया के प्राचीन निवासियों में से हैं। आदिकाल से धरती पर निवास करने वाले मानव समुदायों को आदिवासी कहा गया है। संथाल समाज की अपनी विशिष्ट पहचान है। समाज की पारंपरिक रीति-रिवाज, धर्म-संस्कृति, पूजा-पद्धति, न्याय प्रणाली तथा जन्म से मृत्यु तक के सामाजिक क्रियाकलापों को अनुशासित और मर्यादित बनाए रखने के लिए पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले माझी-पारगना व्यवस्था की स्थापना की थी।
उन्होंने कहा कि पूर्वजों ने मारांग बुरु के सानिध्य में लुगु बाबा के नेतृत्व में लंबे समय तक विचार-मंथन के बाद इस पारंपरिक व्यवस्था को स्थापित किया, जो आज भी समाज में अलिखित रूप से प्रचलित है। वक्ताओं ने दावा किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) के तहत रूढ़ि एवं प्रथा को कानून में मान्यता प्राप्त है और इसी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के माध्यम से माझी-पारगना आरिचाली के तहत समाज का संचालन होता है।
पारंपरिक व्यवस्था से दूर होती नई पीढ़ी चिंता का विषय
परगना बाबाओं ने कहा कि वर्तमान समय में समाज के लोग अपनी पारंपरिक व्यवस्था, धर्म-संस्कृति, पूजा-पद्धति और न्याय प्रणाली से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। यह समाज के लिए चिंता का विषय है। धोरोम सेनेलेद् 2026 का उद्देश्य समाज के लोगों को धार्मिक व्यवस्था से जोड़े रखना और नई पीढ़ी को पारंपरिक धार्मिक क्रियाकलापों एवं मान्यताओं से परिचित कराना है।
उन्होंने कहा कि सम्मेलन के माध्यम से धार्मिक आस्था को अक्षुण्ण बनाए रखने, धर्मांतरण को रोकने तथा आदिवासी समाज की धार्मिक धरोहरों को सुरक्षित एवं संरक्षित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इनमें मारांग बुरु, लुगु बुरु, आजोदिया बुरु, जांग बाहा तुपुनाई घाट और राजरपा: सहित अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल शामिल हैं।
धर्मांतरण को लेकर जताई चिंता
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज दुनिया के सभी धर्मों का सम्मान करता है। हालांकि, उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों से अन्य समुदायों एवं धर्मों के कुछ लोग आदिवासियों को आकर्षित कर धर्मांतरित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इसे कानूनन अपराध बताते हुए समाज के लोगों को ऐसे प्रयासों के प्रति सतर्क रहने की अपील की।
उन्होंने कहा कि कुछ लोगों द्वारा आदिवासी समाज को धर्म के नाम पर बांटने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में समाज को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है। सम्मेलन के माध्यम से समाज के लोगों को धर्म के प्रति जागरूक करने तथा पारंपरिक धर्म-संस्कृति और धार्मिक पद्धतियों का प्रचार-प्रसार किया जाएगा।
पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होने की अपील
आयोजकों ने समाज के लोगों से अपील की कि वे 6 सितंबर को कोरोनडीह स्थित दिसोम जाहेरथान में आयोजित धोरोम सेनेलेद् 2026 में अधिक से अधिक संख्या में शामिल हों। उन्होंने लोगों से पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचकर धार्मिक पद्धति एवं विधि-विधान को जानने और नई पीढ़ी को अपनी परंपरा से जोड़ने का आह्वान किया।
संवाददाता सम्मेलन में देश पारानिक बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, नवीन मुर्मू, माझी बाबा बिंदे सोरेन, सुनील सोरेन, भुगलू सोरेन, नाथो टुडू, पोरेश हांसदा, बुद्धेश्वर किस्कू, गोपाल हांसदा सहित अन्य लोग मौजूद थे।
